एक ही काम, दो अलग प्रमाणपत्र? क्रिकेट, कॉरपोरेट ताक़त और “देशभक्ति” का दोहरा मापदंड

एक ही काम, दो अलग प्रमाणपत्र?

क्रिकेट, कॉरपोरेट ताक़त और “देशभक्ति” का दोहरा मापदंड

भारत में क्रिकेट अब सिर्फ़ खेल नहीं रहा, वह राजनीति, कॉरपोरेट ताक़त और राष्ट्रवाद की भाषा भी बोलने लगा है। इसी बीच एक गंभीर सवाल खड़ा होता है
क्या देशभक्ति का पैमाना सबके लिए एक-सा है, या यह ताक़त और पहचान देखकर बदला जाता है?

मामला 1: शाहरुख़ ख़ान और मुस्ताफ़िज़ुर रहमान

जब आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स ने बांग्लादेशी गेंदबाज़ मुस्ताफ़िज़ुर रहमान को खरीदा, तो सोशल मीडिया और कुछ टीवी बहसों में सवाल उठने लगे:

  • “बांग्लादेशी खिलाड़ी क्यों?”

  • “देशहित का क्या?”

  • “क्या यह राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ नहीं?”

कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि यह फैसला देशद्रोह जैसा है।

मामला 2: मुकेश अंबानी और शाकिब अल हसन

दूसरी तरफ़ ILT20 (यूएई) में MI Emirates टीम के लिए बांग्लादेश के स्टार ऑल-राउंडर शाकिब अल हसन खेल रहे हैं। टीम की मालिक — रिलायंस ग्रुप (मुकेश अंबानी)

यहाँ:

  • न कोई हंगामा

  • न कोई टीवी डिबेट

  • न कोई “देशभक्ति” का सवाल

सवाल खिलाड़ी का है या ताक़त का? अगर दोनों मामलों को तथ्यों के आधार पर देखें तो:

  • दोनों विदेशी खिलाड़ी हैं

  • दोनों प्रोफेशनल लीग में खेल रहे हैं

  • दोनों को फ्रेंचाइज़ी ने पैसे देकर खरीदा है

  • दोनों फैसले पूरी तरह व्यावसायिक (commercial) हैं

फिर फर्क क्यों?

👉 फर्क नाम, ताक़त और नैरेटिव कंट्रोल का है।

कॉरपोरेट राष्ट्रवाद की सच्चाई

आज “देशभक्ति” को:

  • एक ब्रांडिंग टूल बना दिया गया है

  • चुनिंदा लोगों के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है

  • और आम नागरिक के लिए भावनात्मक हथियार बना दिया गया है

जिसके पास:

  • बड़ा कॉरपोरेट नाम है

  • मीडिया तक पहुंच है

  • सत्ता के क़रीब होने की छवि है

उसके फैसले को रणनीति (strategy) कहा जाता है। और जो इस दायरे से बाहर है, उस पर राष्ट्रवाद का सवाल खड़ा कर दिया जाता है।

क्रिकेट का बुनियादी सच

सच यह है:

  • IPL हो या ILT20 — ये बिज़नेस मॉडल पर चलने वाली लीग हैं

  • खिलाड़ी पासपोर्ट से नहीं, प्रदर्शन से चुने जाते हैं

  • फ्रेंचाइज़ी मालिक सरकार या सेना के प्रतिनिधि नहीं होते

इसलिए:

शाकिब खेलें तो देशभक्ति, मुस्ताफ़िज़ुर खेलें तो देशद्रोह यह तर्क न क्रिकेट का है, न राष्ट्र का।

असली देशभक्ति क्या है? असली देशभक्ति का मतलब है:

  • एक जैसे नियम, सबके लिए

  • ताक़तवर और आम आदमी के लिए अलग पैमाना नहीं

  • सवाल पूछने की आज़ादी

अगर समाज सच में मज़बूत बनाना है तो:

  • भावनाओं से नहीं, तर्क से सोचना होगा

  • नाम से नहीं, नीति से निर्णय करना होगा

निष्कर्ष

यह लेख किसी खिलाड़ी, धर्म या व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं है। यह दोहरे मापदंड के ख़िलाफ़ है। क्योंकि जब देशभक्ति चुनिंदा लोगों के लिए अलग-अलग हो जाती है,
तो वह राष्ट्रप्रेम नहीं रहती, सिर्फ़ ताक़त का प्रचार बन जाती है।

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