भारतीय मुसलमानों की पहचान को लेकर एक सुनियोजित वैचारिक जाल पिछले कुछ दशकों से लगातार बुना जा रहा है। भारतीय मीडिया और संप्रदायिक ताकतें जब मुसलमानों को “मुग़लों की औलाद” कहकर संबोधित करती हैं, तो यह केवल एक ऐतिहासिक भूल नहीं बल्कि एक राजनीतिक रणनीति है। यह रणनीति मुसलमानों को विदेशी, आक्रांता और सत्ता-लोलुप साबित… Continue reading
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झटका बनाम हलाल मीट : हिंदू धार्मिक आस्था या मुस्लिम-विरोधी राजनीति ? धार्मिक और वैज्ञानिक विश्लेषण
झटका मांस का प्रचार: हिंदू धार्मिक आस्था या मुस्लिम-विरोधी राजनीति ? धार्मिक और वैज्ञानिक विश्लेषण भारत आज एक ऐसे सामाजिक दौर से गुजर रहा है जहाँ खाने-पीने के चुनाव भी अब केवल स्वाद या सेहत तक सीमित नहीं रहे। भोजन आज पहचान, धर्म, मीडिया नरेटिव और व्यापारिक हितों से जुड़ता जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि… Continue reading
संघ–बीजेपी का ‘ओवैसी एजेंडा’ : ज़ुल्म, दंगे और ध्रुवीकरण से लंबा शासन
संघ–बीजेपी का ‘ओवैसी एजेंडा’ दरअसल ज़ुल्म, दंगों और सुनियोजित ध्रुवीकरण के ज़रिए लंबे शासन की एक गहरी राजनीतिक रणनीति है, जिसे समझे बिना आज देश में पैदा हो रही बेचैनी को समझा नहीं जा सकता। आज देश के एक बड़े हिस्से में, खासकर मुस्लिम नौजवानों के बीच गुस्सा, अपमान की पीड़ा, डर और साथ ही… Continue reading
एक ही काम, दो अलग प्रमाणपत्र? क्रिकेट, कॉरपोरेट ताक़त और “देशभक्ति” का दोहरा मापदंड
एक ही काम, दो अलग प्रमाणपत्र? क्रिकेट, कॉरपोरेट ताक़त और “देशभक्ति” का दोहरा मापदंड भारत में क्रिकेट अब सिर्फ़ खेल नहीं रहा, वह राजनीति, कॉरपोरेट ताक़त और राष्ट्रवाद की भाषा भी बोलने लगा है। इसी बीच एक गंभीर सवाल खड़ा होता हैक्या देशभक्ति का पैमाना सबके लिए एक-सा है, या यह ताक़त और पहचान देखकर… Continue reading
राजनीति, नफ़रत और व्यापार: मुसलमान को विलेन बनाने का पैटर्न
जब ग़ुस्सा धर्म पर उतरे और कारोबार सुरक्षित रहे आधुनिक राजनीति की सबसे ख़तरनाक चाल यह है कि वह जनता को असली सवालों से भटकाने के लिए एक स्थायी दुश्मन गढ़ देती है। आज भारतीय राजनीति में वह दुश्मन वह विलेन मुसलमान बना दिया गया है। बंगलादेश में एक हिंदू युवक की लिंचिंग होती है।… Continue reading