संघ–बीजेपी का ‘ओवैसी एजेंडा’ : ज़ुल्म, दंगे और ध्रुवीकरण से लंबा शासन

संघ–बीजेपी का ‘ओवैसी एजेंडा’ दरअसल ज़ुल्म, दंगों और सुनियोजित ध्रुवीकरण के ज़रिए लंबे शासन की एक गहरी राजनीतिक रणनीति है, जिसे समझे बिना आज देश में पैदा हो रही बेचैनी को समझा नहीं जा सकता। आज देश के एक बड़े हिस्से में, खासकर मुस्लिम नौजवानों के बीच गुस्सा, अपमान की पीड़ा, डर और साथ ही एक खास नेता और एक खास पार्टी के लिए भावनात्मक जुड़ाव दिखाई देता है, लेकिन यह जुड़ाव न तो अचानक पैदा हुआ है और न ही किसी एक बयान, एक चुनाव या एक दंगे का नतीजा है, बल्कि इसके पीछे एक लंबी, सुनियोजित और खतरनाक राजनीतिक योजना काम कर रही है।

असल सवाल यह नहीं है कि बीजेपी मुसलमानों से नफरत क्यों करती है, असल सवाल यह है कि उसे इस नफरत को ज़िंदा क्यों रखना है, जबकि आज केंद्र में भी बीजेपी की सरकार है और देश के ज़्यादातर राज्यों में भी बीजेपी या उसकी सहयोगी सरकारें हैं, ईडी, सीबीआई, पुलिस, प्रशासन, सेना, न्यायपालिका और विश्वविद्यालयों जैसी लगभग हर संस्था पर सरकार का सीधा या परोक्ष नियंत्रण है, फिर भी मस्जिदें गिराई जाती हैं, नबी-ए-इस्लाम पर भद्दी टिप्पणियाँ होती हैं, मुसलमानों को घुसपैठिया, जिहादी और आतंकवादी साबित करने की कोशिश की जाती है, और अगर सत्ता, ताक़त और संसाधन सब कुछ उनके पास है तो यह स्थायी नफरत क्यों ज़रूरी है। इसका जवाब साफ है कि बीजेपी को सत्ता में बने रहने के लिए एक दुश्मन चाहिए और सबसे मुफ़ीद दुश्मन वही होता है जो डर भी पैदा करे और आसानी से बहुसंख्यक को लामबंद भी कर दे, इसलिए लंबे शासन के लिए ‘मुस्लिम ख़तरे’ का ज़िंदा रहना ज़रूरी बना दिया गया।

पहले यह काम इतिहास के ज़रिए किया गया, मुग़लों को कब्र से निकाल कर चुनाव लड़े गए, औरंगज़ेब, बाबर और टीपू सुल्तान को विलेन बनाया गया, लेकिन एक समय के बाद सवाल उठा कि कब तक मुग़लों को चुनाव में बेचा जाएगा, नई पीढ़ी के लिए नया ख़ौफ चाहिए था और यहीं से मौजूदा मुस्लिम चेहरे और मुस्लिम पार्टी का प्रोजेक्ट शुरू होता है। संघ-बीजेपी की सोच साफ है कि मुसलमान अपने मुहल्लों में सिमट जाएँ, सुरक्षा के नाम पर घेटो बनें, मुसलमानों की अलग राजनीतिक पहचान बने और उनका एक अलग नेता हो, क्योंकि जब मुसलमान एक तरफ होंगे तो हिंदू अपने-आप दूसरी तरफ लामबंद हो जाएँगे और यही परफेक्ट ध्रुवीकरण है। इस रणनीति में दंगे सबसे अहम औज़ार हैं और यह समझना ज़रूरी है कि भारत में दंगे कभी अचानक नहीं होते बल्कि कराए जाते हैं, चाहे वह भागलपुर हो, हाशिमपुरा हो, मेरठ-मलियाना हो, मुज़फ्फरनगर हो, अहमदाबाद-गोधरा के बाद का गुजरात हो, कलकत्ता हो या हैदराबाद हो, इन तमाम दंगों में वीएचपी और बजरंग दल जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों की भूमिका सामने आई, इन पर केस हुए, जांच रिपोर्ट आईं और गवाह सामने आए, लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम नौजवानों के दिमाग़ में यह बात बैठा दी गई कि इसके लिए कांग्रेस या समाजवादी जैसे सेकुलर दल ज़िम्मेदार हैं।

भागलपुर इसका सबसे साफ उदाहरण है, जहाँ वीएचपी की रामशिला यात्रा को ज़बरदस्ती मुस्लिम मुहल्लों से निकालने की कोशिश की गई, उकसाने वाले नारे लगाए गए, माहौल बिगाड़ा गया और फिर एक भयावह नरसंहार हुआ, लेकिन आज भी बहुत से मुस्लिम युवा यही मानते हैं कि सेकुलर दल ही इसके कसूरवार थे। लगातार दंगे, पुलिसिया ज़ुल्म, न्याय न मिलना और मीडिया ट्रायल एक क़ौम के भीतर गुस्सा पैदा करते हैं और फिर स्वाभाविक सवाल जन्म लेता है कि हमारा कोई अपना क्यों नहीं और हमारी आवाज़ कौन बनेगा, यही वह डिमांड है जिसे रणनीति के तहत पैदा किया गया। जब डिमांड पैदा हो गई तो सप्लाई भी तय कर दी गई, क्योंकि AIMIM और ओवैसी दशकों से राजनीति में होने के बावजूद अचानक हर टीवी डिबेट में वही चेहरा दिखाई देने लगा, हर मुस्लिम मुद्दे पर वही आवाज़ बनने लगे, बंगाल चुनाव में ओवैसी बनाम ममता का नैरेटिव चलाया गया और एक सांसद होने के बावजूद उन्हें सबसे ज़्यादा स्क्रीन टाइम मिला, क्योंकि जब ज़ुल्म का शिकार तबका रोज़ अपने जैसे चेहरे को टीवी पर देखता है तो वही उसका हीरो बन जाता है।

बीजेपी शासन में हिजाब विवाद, दाढ़ी-टोपी पर रोक-टोक, बुलडोज़र राजनीति, मॉब लिंचिंग हुईं, लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम युवाओं का गुस्सा बीजेपी से ज़्यादा सेकुलर दलों पर दिखाई देता है, क्योंकि अब हीरो और विलेन तय कर दिए गए हैं, जहाँ ओवैसी हीरो हैं और जो उन्हें चुनौती दे वह विलेन है, इसलिए कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और सेकुलर ताक़तें दुश्मन बना दी गईं, जबकि असली ज़ुल्म करने वाली ताक़त परदे के पीछे सुरक्षित खड़ी रहती है। मुस्लिम बहुल सीटों पर ही चुनाव लड़ने का मकसद भी यही है कि मुस्लिम वोट बँटे, सेकुलर हिंदू वोट बीजेपी की तरफ जाए, या तो ओवैसी जीतें तो डर का नैरेटिव बने और अगर सेकुलर उम्मीदवार हारे तो बीजेपी मज़बूत हो, यानी दोनों ही हालात में जीत बीजेपी की हो। यह कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक फिक्स गेम है, जिसमें ज़ुबानी और जिस्मानी ज़ुल्म, दंगे, मीडिया में ओवैसी का उभार और मुस्लिम युवाओं का भावनात्मक जुड़ाव सब रणनीति का हिस्सा हैं, और इसका दूरगामी नुकसान यह है कि सेकुलर राजनीति कमज़ोर होती जा रही है, साझा हिंदू-मुस्लिम राजनीति टूट रही है, मुसलमान घेटो में बंद होते जा रहे हैं और बीजेपी का शासन लंबा होता जा रहा है। अब आख़िरी सवाल यह है कि क्या हम दंगे कराने वालों को भूल कर साझा राजनीति करने वालों को ही दुश्मन मानते रहेंगे, क्योंकि अगर आज भी यह पैटर्न नहीं समझा गया तो नुकसान सिर्फ मुसलमानों का नहीं होगा, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को होगा।

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