बंगलादेश में दीपू दास की लिंचिंग की घटना निस्संदेह दिल दहला देने वाली है। भीड़ द्वारा किसी भी इंसान की हत्या चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या देश का हो इंसानियत के ख़िलाफ़ अपराध है। दीपू दास की हत्या की जितनी निंदा की जाए, कम है।
लेकिन इस घटना के बाद एक और सच्चाई सामने आई है, जो हत्या से कम भयावह नहीं है — हमारी चयनात्मक संवेदना।
मैं देख रहा हूँ कि मेरे वीडियो पर कुछ हिंदू भाई लगातार मांग कर रहे हैं कि “दीपू दास पर वीडियो बनाइए”, कुछ गाली-गलौज कर रहे हैं, और तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि दीपू दास पर बात होनी चाहिए या नहीं — ज़रूर होनी चाहिए। सवाल यह है कि संवेदना धर्म आधारित क्यों हो गई है?
अगर दीपू दास की हत्या पर हमारी आत्मा काँपती है, तो
अख़लाक़ को उसके घर से घसीटकर मार दिया गया
पहलू ख़ान को कैमरे के सामने पीट-पीटकर मार डाला गया
तबरेज़ अंसारी को “जय श्रीराम” कहलवाकर मौत दी गई
तो उस वक़्त हमारा सामूहिक ज़मीर क्यों ख़ामोश था?
तब क्यों कहा गया
“देखिए पूरा मामला क्या है”
“वीडियो एडिटेड है”
“मुसलमान भी तो…”
यानि दीपू दास पर संवेदना हिंदू की ज़िम्मेदारी और अख़लाक़–तबरेज़ पर संवेदना मुसलमान के भरोसे?
क्या इंसान की हत्या अब धार्मिक कोटे में बाँट दी गई है?
भारत में 2015 से अब तक लिंचिंग की अधिकांश घटनाएँ मॉब जस्टिस के नाम पर हुईं, और
पीड़ितों में ज़्यादातर अल्पसंख्यक थे
मामलों में सज़ा की दर बेहद कम रही
कई मामलों में आरोपी खुलेआम राजनीतिक संरक्षण पाते दिखे
यह कहना कि “हम सब बराबर दुखी होते हैं” एक ख़ूबसूरत झूठ है, जिसे आँकड़े बार-बार बेनक़ाब करते हैं।
क़ुरआन इंसान की जान को धर्म से नहीं जोड़ता, बल्कि इंसान होने से जोड़ता है:
“जिसने किसी एक निर्दोष इंसान की हत्या की, उसने पूरी मानवता की हत्या की।”
(सूरह अल-माइदा 5:32)
यह आयत यह नहीं कहती कि
“अगर मुसलमान मरे तो मानवता मरे”
या
“अगर हिंदू मरे तो मानवता मरे”
यह साफ़ कहती है इंसान मरा, तो इंसानियत मरी।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के दौर में एक यहूदी का जनाज़ा गुज़रा। आप ﷺ खड़े हो गए। सहाबा ने कहा: “या रसूलल्लाह, यह तो यहूदी है।”
आप ﷺ ने जवाब दिया:
“क्या वह इंसान नहीं था?”
आज हमें यही सवाल खुद से पूछना चाहिए।
असल समस्या दीपू दास या अख़लाक़ नहीं हैं।
असल समस्या है नैरेटिव की राजनीति।
जब पीड़ित “हमारा” हो → वह मासूम
जब पीड़ित “दूसरा” हो → पहले शक
यही सोच भीड़ को ताक़त देती है, और हत्यारों को नैतिक लाइसेंस।
अगर आपकी संवेदना सिर्फ़ अपने धर्म तक सीमित है,
तो माफ़ कीजिए —
वह संवेदना नहीं, सांप्रदायिक प्रतिक्रिया है।
और अगर आप चाहते हैं कि मैं दीपू दास पर बोलूँ,
तो पहले यह स्वीकार कीजिए कि
अख़लाक़, पहलू ख़ान और तबरेज़ भी उतने ही इंसान थे।
वरना हर दीपू दास के बाद
एक नया अख़लाक़ मरेगा,
और हम फिर तय करेंगे कि
इस बार दुख किसे करना है।
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