आधुनिक राजनीति की सबसे ख़तरनाक चाल यह है कि वह जनता को असली सवालों से भटकाने के लिए एक स्थायी दुश्मन गढ़ देती है। आज भारतीय राजनीति में वह दुश्मन वह विलेन मुसलमान बना दिया गया है।
बंगलादेश में एक हिंदू युवक की लिंचिंग होती है। घटना निंदनीय है, दिल दहला देने वाली है। लेकिन उसी बंगलादेश में भारतीय कंपनियाँ, भारतीय उद्योगपति, भारतीय पूँजी बिना किसी रुकावट के कारोबार करती रहती हैं। न किसी मंच से उनकी देशभक्ति पर सवाल उठता है, न उनके बहिष्कार की मांग होती है, न उनकी संपत्तियाँ सीज़ करने की बातें होती हैं।
लेकिन भारत में ही उसी घटना के बहाने शाहरुख़ ख़ान की ज़ुबान काटने की धमकी दी जाती है। इनाम घोषित होता है। उसकी संपत्ति जब्त करने की बात होती है। सवाल उठता है: क्यों? क्योंकि राजनीति को एक चेहरा चाहिए। और उस चेहरे का धर्म मुसलमान होना चाहिए।
कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) सिर्फ़ शाहरुख़ ख़ान की कंपनी नहीं है। उसके सह-मालिक जय मेहता हैं , एक बड़े उद्योगपति, हिंदू कारोबारी। लेकिन किसी ने जय मेहता की ज़ुबान काटने का इनाम घोषित नहीं किया। फिल्म पठान के निर्देशक, निर्माता, कहानी लेखक, गीतकार, संगीतकार, फैशन डिज़ाइनर, कोरियोग्राफ़र ज़्यादातर हिंदू थे। लेकिन निशाना सिर्फ़ शाहरुख़ ख़ान बने। क्यों? क्योंकि नफ़रत को धर्म चाहिए, पेशा नहीं।
भारत के अलग-अलग हिस्सों से लगातार ख़बरें आती हैं:
लेकिन जब मारने वाला हिंदू होता है, तो:
और जब मारने वाला मुसलमान निकलता है जैसे बंगलादेश की घटना में तो पूरी क़ौम कटघरे में खड़ी कर दी जाती है। यही है नैरेटिव इंजीनियरिंग।
नीचे वे कंपनियाँ हैं जिनका पूँजी, सोर्सिंग या उत्पादन स्तर पर बंगलादेश से सीधा संबंध है, और जिनका कारोबार आज भी सुचारू रूप से चल रहा है:
👉 नोट: इन कंपनियों के ख़िलाफ़ न कोई प्रदर्शन, न बहिष्कार, न देशद्रोह के नारे।
जब मसला व्यापार का हो, तब राष्ट्रवाद सो जाता है।
जब मसला धर्म का हो, तब भीड़ जगा दी जाती है।
यह संयोग नहीं है। यह एक राजनीतिक रणनीति है:
यह पैटर्न नया नहीं है। बस अब ज़्यादा संगठित है।
अगर बंगलादेश की घटना पर सच में ग़ुस्सा है, तो:
और अगर सवाल सिर्फ़ शाहरुख़ ख़ान से है, तो मान लीजिए यह ग़ुस्सा इंसाफ़ का नहीं, नफ़रत का है।
भारत को आज हिंदू मुस्लिम नफ़रत नहीं, बल्कि सच से सामना चाहिए। जिस दिन सवाल धर्म से नहीं, सिस्टम से पूछे जाने लगेंगे उस दिन कोई शाहरुख़ ख़ान नहीं, कोई बंगाली मज़दूर नहीं, कोई आम हिंदू भी सुरक्षित होगा।
विलेन कोई क़ौम नहीं होती। विलेन वह राजनीति होती है जो नफ़रत से सत्ता चलाती है।
आज जब आधे सच, नफ़रत और प्रोपेगेंडा को तेज़ आवाज़ दी जा रही है, तब तथ्य, संदर्भ और ईमानदार पत्रकारिता को आपकी मदद की ज़रूरत है।
QamarKranti.com का यह प्रयास किसी धर्म, समुदाय या व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि झूठे नैरेटिव के ख़िलाफ़ सच रखने की कोशिश है। ऐसे लेख लिखने, रिसर्च करने और बिना डर सवाल उठाने के लिए आपकी भागीदारी ज़रूरी है।
अगर आप चाहते हैं कि:
तो कृपया QamarKranti.com को सब्सक्राइब कर सहयोग दें:
मासिक / वार्षिक Subscription विकल्प:
₹100 / ₹200 / ₹500 / ₹1000 / ₹1500 / ₹2000 / ₹5000
आपका छोटा सा सहयोग सच की बड़ी लड़ाई को ताक़त देता है।
सच के साथ खड़े हों। QamarKranti.com को मज़बूत करें।
सियासत में अक्सर जो दिखाई देता है, वह होता नहीं; और जो होता है, वह…
भारतीय मुसलमानों की पहचान को लेकर एक सुनियोजित वैचारिक जाल पिछले कुछ दशकों से लगातार…
झटका मांस का प्रचार: हिंदू धार्मिक आस्था या मुस्लिम-विरोधी राजनीति ? धार्मिक और वैज्ञानिक विश्लेषण…
संघ–बीजेपी का ‘ओवैसी एजेंडा’ दरअसल ज़ुल्म, दंगों और सुनियोजित ध्रुवीकरण के ज़रिए लंबे शासन की…
एक ही काम, दो अलग प्रमाणपत्र? क्रिकेट, कॉरपोरेट ताक़त और “देशभक्ति” का दोहरा मापदंड भारत…
आज भारत में जब भी “इतिहास” की बात होती है, तो कुछ तय नाम उछाले…