आज सोशल मीडिया, यूट्यूब और ब्लॉग्स पर एक दावा बार-बार दोहराया जा रहा है कि इस्लाम अपने मानने वालों को काफ़िर माता-पिता से रिश्ता तोड़ने की शिक्षा देता है। इस दावे के समर्थन में अक्सर सूरह तौबा, आयत 23 को संदर्भ से काटकर पेश किया जाता है।
लेकिन सवाल यह है क्या यह दावा पूरे क़ुरान, उसके शाने-नुज़ूल, और नबी ﷺ की व्यवहारिक शिक्षा से मेल खाता है? या यह एक चयनात्मक व्याख्या है, जिसे वैचारिक एजेंडे के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है?
क़ुरान 9:23 (अनुवाद):
“ऐ ईमान वालों! अपने बाप और भाइयों को औलिया न बनाओ, यदि वे ईमान पर कुफ़्र को तरजीह दें। और तुम में से जो उन्हें औलिया बनाएगा, वही ज़ालिम होगा।”
इसी आयत को आधार बनाकर यह निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि इस्लाम माता-पिता से संबंध तोड़ने को कहता है। जबकि यह निष्कर्ष आयत के शब्दार्थ और संदर्भ—दोनों के ख़िलाफ़ है।
अरबी शब्द औलिया (Awliya) का अर्थ है:
यह शब्द पारिवारिक प्रेम, सेवा, सम्मान या मानवीय रिश्तों के लिए प्रयोग नहीं होता।
प्रमुख तफ़सीरों (इब्न कसीर, तबरी, क़ुर्तुबी) के अनुसार:
निष्कर्ष: क़ुरान 9:23 माता-पिता से रिश्ता तोड़ने की नहीं, बल्कि अन्याय के पक्ष में खड़े लोगों से रणनीतिक समर्थन हटाने की बात करता है।
अगर इस्लाम सचमुच माता-पिता से रिश्ता तोड़ने को कहता, तो क़ुरान की ये आयतें कैसे मौजूद होतीं?
“और यदि वे तुम्हें मेरे साथ किसी को साझी बनाने पर मजबूर करें, तो उनकी बात न मानो लेकिन दुनिया के मामलों में उनके साथ भलाई करते रहो।”
“हमने इंसान को उसके माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दिया।”
“अपने माता-पिता के साथ एहसान करो, और उन्हें ‘उफ़’ तक न कहो।”
👉 ये आयतें साफ़ बताती हैं कि:
इतिहास भी Ex-Muslim नैरेटिव का समर्थन नहीं करता।
उत्तर: “हाँ, उनसे अच्छे संबंध रखो।” (सहीह बुख़ारी)
अगर इस्लाम माता-पिता से रिश्ता तोड़ने को कहता, तो यह हदीस संभव ही नहीं होती।
यही नैतिक सिद्धांत महाभारत में भी मिलता है।
गीता 2:31: “धर्म के पक्ष में खड़ा होना क्षत्रिय का कर्तव्य है।”
लेकिन:
यही अंतर क़ुरान 9:23 भी करता है रिश्ता बनाम वफ़ादारी।
यह आलोचना नहीं, बल्कि चयनात्मक प्रोपेगेंडा है।
इस्लाम का संदेश स्पष्ट है:
इस्लाम रिश्ता तोड़ने की नहीं, अन्याय से दूरी बनाने की शिक्षा देता है।
जो लोग इसे “काफ़िर माता-पिता से रिश्ता तोड़ने” के रूप में पेश करते हैं, वे या तो पूरे क़ुरान से अनजान हैं या जानबूझकर अधूरा सच परोस रहे हैं।
आज जब आधे सच, नफ़रत और प्रोपेगेंडा को तेज़ आवाज़ दी जा रही है, तब तथ्य, संदर्भ और ईमानदार पत्रकारिता को आपकी मदद की ज़रूरत है।
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