बंगाल का अठारहवीं सदी का इतिहास आज भी राजनीति और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का शिकार है। बर्गी मराठों की लूट, बंगाल का आर्थिक संकट और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘आनंद मठ’—इन तीनों को मिलाकर एक ऐसा नैरेटिव गढ़ा गया जिसमें हर तबाही का दोष मुस्लिम नवाबों पर डाल दिया गया। लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्य इस सरलीकृत कहानी से कहीं अधिक जटिल हैं।
1740 के दशक में बंगाल पर बर्गी मराठों के हमले किसी धार्मिक संघर्ष का हिस्सा नहीं थे। यह चौथ और सरदेशमुखी की वसूली के लिए की गई संगठित हिंसा थी।
बंगाल के लोकगीतों में आज भी डर के साथ कहा जाता है—“बर्गी एलो देशे”। यह भय धर्म का नहीं, आतंक का था।
मुर्शिद क़ुली ख़ान को अक्सर साम्प्रदायिक चश्मे से देखा गया। जबकि उनकी वास्तविक लड़ाई मुग़ल दरबार द्वारा थोपे गए अनुचित कर-शोषण के खिलाफ थी।
उन्होंने बंगाल की आर्थिक स्वायत्तता बचाने का प्रयास किया और प्रशासनिक सुधार लागू किए। उनकी नीतियों को धर्म से जोड़ना ऐतिहासिक ईमानदारी के खिलाफ है।
पुल-कोट:
“मुर्शिद क़ुली ख़ान की जंग आस्था की नहीं, आर्थिक न्याय की थी।”
‘आनंद मठ’ एक उपन्यास है—इतिहास की पुस्तक नहीं। लेकिन इसे ऐतिहासिक प्रमाण की तरह पेश किया गया।
जबकि बर्गी मराठों द्वारा हिंदू समाज पर की गई व्यापक हिंसा को सीमित रूप में दिखाया गया। यह चयनात्मक प्रस्तुति हिंदू-मुस्लिम साझा पीड़ा को अदृश्य कर देती है।
बंगाल की तबाही का मुख्य कारण था—
विडंबना यह है कि अंग्रेज़ी शासन में हुए संकट का दोष मुस्लिम नवाबों पर डाल दिया गया, जबकि हिंसा और शोषण हर समुदाय पर समान रूप से हुआ।
आज इतिहास को इस तरह पेश किया जाता है कि वह समाज को जोड़ने की बजाय तोड़ दे। बर्गी आतंक को भुलाकर, ‘आनंद मठ’ की चुनिंदा पंक्तियों को हथियार बनाया जाता है। यह इतिहास नहीं, राजनीति है।
इतिहास का उद्देश्य नफरत फैलाना नहीं, सच्चाई सामने लाना है।
बंगाल की जनता धर्म से नहीं, सत्ता और लालच से पीड़ित थी।
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