आज भारत में जब भी “इतिहास” की बात होती है, तो कुछ तय नाम उछाले जाते हैं महमूद ग़ज़नवी, खिलजी, औरंगज़ेब। मानो इस देश में खून सिर्फ़ उन्हीं के दौर में बहा हो। लेकिन सवाल यह है क्या हिंसा का इतिहास सिर्फ़ मुस्लिम शासकों तक सीमित था? क्या हिंदू राजा, मराठा, राजपूत या सिख शासक युद्धों में निर्दोषों की हत्या से अछूते रहे? अगर जवाब ईमानदारी से दिया जाए, तो सच्चाई बहुत असहज है।
राजा हिंदू हो या मुस्लिम युद्ध का मक़सद था:
इलाक़ा
टैक्स
सत्ता
संसाधन
धर्म अक्सर राजनीतिक औज़ार था, नैतिक ढाल नहीं।
जब बंगाल में नवाब अलीवर्दी ख़ान का शासन था, तब मराठा सेनाओं ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर बार-बार हमले किए।
मराठा लुटेरे सैनिक, जिन्हें स्थानीय लोग “बर्गी” कहते थे।
हज़ारों गाँव जला दिए गए
महिलाओं और बच्चों की हत्या
किसानों को ज़िंदा काटा गया
अनाज लूटा गया → भयानक भुखमरी
इतिहासकार बताते हैं कि लाखों आम लोग मारे गए इनमें ज़्यादातर हिंदू किसान थे। बंगाल की लोककथा आज भी कहती है:
“छेले घुमालो, पाड़ा जुरालो, बर्गी एलो देशे”
(बच्चों को सुला लो, गाँव शांत कर लो बर्गी आ रहे हैं)
❓ सवाल:
क्या आज कोई इसे “हिंदू अत्याचार” कहता है? नहीं। क्योंकि तब राजा हिंदू था लेकिन पीड़ित भी हिंदू थे।
मराठा साम्राज्य का विस्तार केवल मुस्लिम इलाक़ों तक सीमित नहीं था।
जयपुर, जोधपुर, मेवाड़ जैसे हिंदू राज्यों पर हमले
मंदिरों को नुकसान
गाँवों की लूट
इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि मराठा सेनाएँ “स्थायी शासन नहीं, लूट आधारित युद्ध” करती थीं।
12वीं सदी का ग्रंथ राजतरंगिणी (कल्हण द्वारा लिखा) कश्मीर के हिंदू राजाओं का लेखा-जोखा देता है।
मंदिर लूटे
ब्राह्मणों की हत्या
विरोधियों की सामूहिक हत्या
यह सब किसी मुस्लिम आक्रमण से पहले हुआ।
❗ यह ग्रंथ किसी “मुस्लिम इतिहासकार” ने नहीं लिखा बल्कि एक हिंदू ब्राह्मण ने लिखा।
पंजाब में जब सत्ता के लिए संघर्ष हुआ:
सिख मिसलें
अफ़ग़ान
स्थानीय हिंदू-मुस्लिम ज़मींदार
तीनों तरफ़ से:
गाँव जले
महिलाओं पर अत्याचार
जबरन वसूली
पीड़ित कौन था?
👉 आम जनता हिंदू भी, मुस्लिम भी, सिख भी।
राजपूत इतिहास गौरवशाली भी है, लेकिन निर्दोष नहीं।
चित्तौड़, रणथंभौर, मालवा
सत्ता के लिए राजपूतों ने राजपूतों का कत्लेआम किया
जौहर इसलिए हुए क्योंकि युद्ध बेरहम थे
❓ क्या आज इन्हें “हिंदू आतंक” कहा जाता है? नहीं इन्हें “वीरता” कहा जाता है।
क्योंकि:
औपनिवेशिक इतिहास ने “Divide & Rule” किया
आधुनिक राजनीति को दुश्मन चाहिए
इतिहास को नैरेटिव के हिसाब से काट-छांट कर पढ़ाया गया
मुस्लिम शासकों के ज़ुल्म गिनाए गए लेकिन:
उनके दौर की शांति नहीं
उनके हिंदू सेनापति नहीं
उनके द्वारा बनाए गए मंदिर-दान नहीं
सब गायब।
अकबर के सेनापति राजा मानसिंह थे
शिवाजी के नौसेना प्रमुख मुस्लिम थे
औरंगज़ेब की सेना में लाखों हिंदू थे
मराठाओं ने हिंदू किसानों को मारा
मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं को प्रशासन में रखा
इतिहास काला-सफेद नहीं, बल्कि ग्रे है।
जब आपसे कहा जाता है:
“हिंदू ख़तरे में है”
या
“मुस्लिम हमेशा आक्रांता रहे”
तब:
नेता सत्ता में सुरक्षित होते हैं
बेरोज़गारी पर बात नहीं होती
महँगाई पर बहस नहीं होती
शिक्षा और स्वास्थ्य ग़ायब हो जाते हैं
अगर:
मराठा द्वारा मारे गए हिंदू याद नहीं
राजपूत युद्धों के पीड़ित याद नहीं
कश्मीर के हिंदू राजा का ज़ुल्म याद नहीं
लेकिन:
सिर्फ़ मुस्लिम शासक याद हैं
तो समस्या इतिहास में नहीं👉 हमारे पढ़ाए जा रहे नैरेटिव में है।
भारत:
बुद्ध और कबीर का देश है
गुरु नानक और सूफ़ियों का देश है
मंदिर-मस्जिद से पहले इंसानियत का देश है
अगर इतिहास से सीख लेनी है, तो नफ़रत नहीं न्याय, विवेक और एकता सीखनी होगी।
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